इस दौरान गोबर, फूल और पत्तियों से सजी विशेष आकृतियां प्रतिदिन दीवार पर तिथि के अनुसार बनाकर संजा देवी का पूजन किया जाता है। शाम को अंधेरा होने पर बालिकाओं की टोलिया एक दूसरे के घर जाकर संजा माता के गीत गाती है और संजा माता की आरती करती है। आरती के बाद प्रसादी वितरित की जाती है। गाने के साथ पूजन कर नैवेद्य का भोग लगाकर प्रसादी वितरण की जाती है। आखिरी दिन किलाकोट नामक आकृति बनाई जाती है।जिसमें चांद, सूरज, हाथी के साथ संजा बाई गाड़ी में सवार होती है।
जाड़ी जसोदा, पतली पेमा, भाई, बहन, डोकर, डोकरी आदि की आकृति बनाई जाती है। जो फूलों और चमकीली पन्नियों से सजाई जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता हैं। संजा माता को ज्ञान व देवी का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाता है। आज वर्तमान में डिजिटल युग में गोबर से बनाई जाने वाली संजा का स्थान कागज के फोटो, पोस्टर ने ले लिया है। शिक्षा और शहरी सोच के कारण इस लोक पर्व का अस्तित्व समाप्ति की कगार पर आ गया है और उत्साह कम हो गया है। हमारी ग्रामीण संस्कृति धरोहर के रूप में इसको बचाने की आवश्यकता है।

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