किसानों के हक पर मार: टैग न लगे माल को मण्डी में एंट्री, बंद है सोयाबीन का तोल

झालावाड़: सरकार किसानों के लिए चाहे लाखों जतन करें, लेकिन भ्रष्ट सरकारी नुमाइंदे और व्यापारियों का सिंडिकेट किस तरह से मिलकर किसानों के हक की कमाई में सेंध लगाता है और सरकारी धन की बंदरबांट करता है। ऐसा ही एक मामला पूर्व मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र झालावाड़ से निकलकर सामने आया है।

सरकार द्वारा किसानों को संबल प्रदान किए जाने के लिए समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है और समर्थन मूल्य पर खरीद करने के लिए तोल केंद्र बनाए जाते हैं, जहां पहले काश्तकार के दस्तावेजों के आधार पर टोकन जारी किया जाता है और उसी के आधार पर तोल केंद्र पर तुलाई होती है। तोल केंद्रों पर खरीदें जाने वाले माल में गुणवत्ता संबंधित सभी नियमों की पालना करनी होती है और माल को 24 घंटे के भीतर पैकिंग व उचित टेग लगाकर निर्धारित  वेयरहाउस में जमा करवाना होता है। लेकिन इन्हीं तोल केंद्रों और वेयरहाउस के बीच कुछ ऐसे घोटाले अंजाम दिए जा रहे है, जिसमें किसानों के हिस्से का लाभ किसानों के हाथ से निकलकर भ्रष्टाचारियों की जेब में जा रहा है। तोल केंद्रों से जब यह माल वेयरहाउस पहुंचता है तो यहां से वेयरहाउस के अधिकारियों की जिम्मेदारी शुरू हो जाती है कि वह माल की गुणवत्ता और नियमों की पालना सुनिश्चित करें। ताकि काम ठीक तरीके से हो पाए। प्रत्येक माल वाहक गाड़ी को चेक किया जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसमें जितना भी बोरी माल लदा हुआ है वह सभी ठीक तरीके से पैक हो और उस पर प्रॉपर टैग लगा हुआ हो।


 
बिना टैग लगे हुए माल को मंडी परिसर में एंट्री किसी भी स्थिति में नहीं दी जाती ऐसा नियम हैं। लेकिन जब झालावाड़ के झालरापाटन रोड स्थित वेयरहाउस पहुंचते हैं तो पूरा मामला ही उल्टा नजर आता है। गोदाम तक पहुंचे तो पाया कि गाड़ियों में जो माल लदा हुआ है, उस पर कोई भी टेग नहीं है और बोरिया भी खुली हुई थी। जिनको गाड़ी में ही मशीन द्वारा पैक किया जा रहा था और टैग व मोहर लगाई जा रही थी। ऐसे में जब वहां पर कार्यरत अधिकारियों को इस मामले की जानकारी मिली तो वह आनन- फानन में भागते हुए आए और मशीन को बंद करवाया।


 पोल खुली तो बौखलाए अधिकारी- 
वेयरहाउस के अधिकारियों ने जब पूरे मामले की पोल खुलते देखा तो वह बौखलाहट और गुस्से में आ गए । मोबाइल झपटने का प्रयास करते हुए कैमरा बंद करने और वहां से बाहर निकालने की लगातार धमकी देने लगे। उसके बाद भी जब बात बनती नजर नहीं आई, तो मैनेजर ने पुलिस को बुलाने की धमकी तक दे डाली। अनायास ही घटित इस घटनाक्रम के दौरान जब संवाददाता ने पूछा कि आप कौन हो तो धमकाने वाले अधिकारी ने बताया कि मैं यहां का मैनेजर हूं और मेरी मर्जी के बिना यहां कोई नहीं घुस सकता।

एसडीएम अभिषेक चरण पहुंचे और लगाई फटकार- 
मामले की जानकारी जब झालावाड़ जिला कलेक्टर अजयसिंह राठौड़ और उपखंड अधिकारी अभिषेक चारण तक पहुंची तो अभिषेक चारण तुरंत प्रभाव से वेयरहाउस पहुंचे तथा मामले की जानकारी लेते हुए उन्होंने वहां मौजूद अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। मौके पर ही वेयरहाउस इंस्पेक्टर को भी बुलवाया तथा नियमों की जानकारी लेकर नाराजगी जताते हुए जांच की बात कही। एसडीएम ने कहा कि नियम साफ तौर पर कहते हैं कि तौल केंद्र से ही माल पैक होकर आएगा और प्रॉपर टैग लगे हुए माल को ही क्वालिटी देखने के बाद वेयरहाउस में एंट्री दी जाएगी।

 सवालों का जवाब नहीं दे पाए वेयरहाउस इंस्पेक्टर -
एसडीएम ने जब मौके पर वेयरहाउस इंस्पेक्टर शितिज सेठी को बुलवाकर उनसे जवाब तलब किया तो वह बगले झांकने लगे और पूरे मामले में ठीक से कोई भी जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने मीडिया से कहा कि लेबर की कमी के कारण ऐसा हो जाता है तथा पूरे घटनाक्रम को उन्होंने गलत भी माना, लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कह पाए।
वहीं एसडीएम अभिषेक चरण के मौके पर पहुंचने तथा इंस्पेक्टर को मौके पर बुलाने के बाद वेयरहाउस मैनेजर अनिल कुमार के तेवर भी बिल्कुल बदल गए। वह तरह- तरह के स्पष्टीकरण देने लगे। लेकिन पूरे मामले की नजाकत को समझते हुए एसडीएम ने उन्हें जमकर फटकार लगाई तथा मामले की विस्तृत जांच की बात कही। मजे की बात यह है कि पूरे घटनाक्रम के दौरान भी वेयरहाउस की बाउंड्री के अंदर तीन ऐसी गाड़ियां खड़ी हुई थी जिनमें बिना टैग लगा हुआ माल भरा हुआ था तथा जिन बोरियों में वह माल पैक किया गया था वह बोरियां भी झालावाड़ की किसी भी मंडी की न होकर किसी शक्तिगढ़ नाम की जगह से लाई गई थी। उसको लेकर मैनेजर से जब सवाल किया गया तो वह इधर- उधर देखने लगे और उन गाड़ियों को नियम अनुसार बाहर निकालने की बात कही।

 क्या है पूरा मामला- 
मामले में पूरी पड़ताल करने के बाद बेहद रोचक तथ्य निकलकर सामने आते हैं और यह साफ हो जाता है कि किस तरह से सरकारी धन की बंदरबाट की जा रही है और सरकार को चूना लगाया जा रहा है। सबसे पहली बात तो यह है कि सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर सोयाबीन की खरीद 4 फरवरी को ही बंद की जा चुकी है ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि कांटे बंद होने के 11 दिन बाद भी माल कहां से आ रहा है?

अब आगे इस सवाल के पीछे छानबीन करते हैं तो पता चलता है कि खरीद केंद्रों पर अधिकारियों कर्मचारियों एवं कुछ व्यापारियों ने मिलकर एक सिंडिकेट बनाया हुआ है जिसके माध्यम से यह पूरा काम किया जाता है, इनकी कार्यप्रणाली की यदि बात करें तो यह पहले उन किसानों को चिन्हित करते हैं जिनके पास जमीन तो है लेकिन उन्होंने सोयाबीन की फसल ना उगाकर उस जमीन में कुछ और फसल उगाई हुई है। ऐसे किसानों को कुछ पैसे का लालच दिया जाता है और उनके दस्तावेजों के आधार पर टोकन कटवाए जाते हैं। फिर उन किसानों का जो माल तोल केंद्र पर आना होता है उसके बदले सिर्फ माल की एंट्री की जाती है माल नहीं आता, और पैसा किस के खाते में आ जाता है। किसान से पहले ही यह सिंडिकेट अपने हिस्से का पैसा एडवांस ले लेता है। अब ऐसे  सभी किसानों के माल के बदले व्यापारियों का जो खराब माल है उसको एडजस्ट किया जाता है। ऐसे व्यापारी जो अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मिलकर इस पूरे खेल को चलते हैं उनके द्वारा जिले में विभिन्न स्थानों पर गोदाम बनाए गए हैं जहां से घटिया माल सीधा पैक करके वेयरहाउस तक आता है और वेयरहाउस में जमा हो जाता है, मजे की बात यह है कि वेयरहाउस में भी मिली भगत के चलते इस माल की क्वालिटी को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस पूरे खेल में जो भी बचत होती है उसका बंटवारा सभी शामिल लोगों के बीच हो जाता है। इस प्रकार से इस पूरे तंत्र को चलाया जाता है और सरकार को बड़ी तादाद में चूना लगा दिया जाता है।

देखना यह है कि अब इस पूरे मामले को सरकार किस तरह से लेती है क्योंकि मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होने पर यह एक बहुत बड़ा घोटाला बन कर ऊभरेगा, ऐसे में जरूरत है कि सरकार इस पूरे मामले को गंभीरता से लेकर इसमें जांच करवाए और पूरे मामले के दोषी लोगों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही अमल में लाई जाए, ताकि वह किसान जो अच्छा माल होते हुए भी इस सिंडिकेट की वजह से समर्थन मूल्य के माध्यम से मिलने वाले सरकारी लाभ से वंचित रह जाते हैं उनके साथ इंसाफ हो सके।

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