डॉ रेखा वर्मा की गर्भवती महिलाओं को अनोखी सौगात, सिजेरियन डिलीवरी में 'प्लेसेंटा मेम्ब्रेन' साबित होगी रामबाण उपचार

कहते है कि कुदरत कई बार कई ऐसे करिश्में करवा देती है, जो व्यक्ति को सोचने और समझने पर मजबूर कर देते है। प्रकृति में हर वो चीज समाहित  है जो असंभव को भी सम्भव बना सकती है। बस जरूरत है तो उसे खोजने, जानने और पहचानने की।एक ऐसा ही कुदरती करिश्मा कर दिखाया है, झालावाड़ के भवानीमंडी स्थित नून हॉस्पिटल की महिला डॉक्टर रेखा वर्मा ने। डॉ वर्मा ने गर्भवती महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी के समय प्राकृतिक चिकित्सा का ऐसा तरीका खोज निकाला, जो गर्भवती महिलाओं ही नहीं अपितु डॉक्टरो व स्वास्थ्य विभाग के लिए भी वरदान सा साबित होगा। प्रसुताओं के ऑपरेशन के बाद पट्टी व बैंडेज की जगह 'प्लेसेंटा मेम्ब्रेन' का उपयोग बायोमेडिकल वेस्ट को तो कम करेगा ही, साथ ही चिकित्सा पद्धति में भी पूर्ण रूप से इकोफ्रेंडली शोध साबित होगा। इसे प्राकृतिक बैंडेज या पट्टी भी कहा जा सकता है। पढिये यह स्पेशल रिपोर्ट..

ब्यूरो रिपोर्ट | झालावाड़: जिले के भवानीमंडी स्थित नून हॉस्पिटल में पदस्थ महिला डॉक्टर रेखा वर्मा ने गर्भवती महिलाओं के लिये एक ऐसी कुदरती चिकित्सा विधि का इजात किया है, जिसकी उत्त्पत्ति डिलीवरी के समय महिला के गर्भ से ही होना बताया गया।सिजेरियन ऑपरेशन के वक्त की जाने वाली ड्रेसिंग की जगह डॉ वर्मा ने एक एक नई तरह की इको फ्रेंडली ड्रेसिंग की खोज की। इसको नेचुरल ड्रेसिंग भी कहा जा सकता है। ऑपरेशन के बाद यह नेचुरल बैंडेज यानी 'प्लेसेंटा मेम्ब्रेन' प्रसुता के घावों को बहुत ही कम समय में रिकवर करने में सहायक होती है। प्लेसेंटा मेम्ब्रेन, जिसे अपरा झिल्ली भी कहते हैं, यह एक महत्वपूर्ण संरचना है। जो गर्भावस्था के दौरान माँ और भ्रूण के बीच पोषक तत्वों और ऑक्सीजन के आदान-प्रदान में मदद करती है।

मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले की रहने वाली नेहा मालवीय की डिलेवरी भवानीमंडी के नून हॉस्पिटल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. रेखा वर्मा द्वारा की गई। मरीज की सिजेरियन डिलेवरी के बाद प्लासेन्टा मेम्ब्रेन का प्रयोग ड्रेसिंग के लिये किया। इसको लेकर डॉ. रेखा वर्मा ने कहा कि ड्रेसिंग में इसका प्रयोग मील का पत्थर साबित हो सकता है। डॉ. वर्मा ने बताया कि ऑपरेशन के बाद सामान्यतया ड्रेसिंग में माईक्रो पेड और बेन्डेज का प्रयोग किया जाता है, पर इन्फेक्शन का चांस भी रहता है। इसके प्रयोग से मरीज 7-8 दिन में रिकवर होता है। साथ ही ड्रेसिंग में माईक्रो पेड और बेन्डेज के प्रयोग में खर्च भी अधिक आता है।

फिर इसके निस्तारण करने से भी कई प्रकार के प्रदुषण होते है। जबकी सिजेरियन डिलेवरी के बाद प्लासेन्टा मेम्ब्रेन का प्रयोग ड्रेसिंग में करने पर  2-3 दिन में ही घाव पूरी तरह भर जाता है और मरीज जल्दी ठीक हो जाता है। साथ ही इसमें कोई खर्च भी नही होता। प्लेसेन्टा मेम्बरेन में स्टेम सेल होती है, जो घाव भरने में सहायक होती है। जो पूर्ण रूप से प्राकृतिक होती है। इसके बायोमेडिकल वेस्ट का खर्च नहीं होता। सिजेरियन ड्रेसिंग के अलावा प्लासेन्टा मेम्बरेन का प्रयोग डायबेटिक, हेपेटायटिस एवं संक्रमण के मरीजो के ऑपरेशन में भी किया जा सकता है।

यूरोपियन देशों में हजारों ऑपरेशन, भारत में पेटेंट के लिए प्रयासरत 

डॉ. वर्मा ने यूरोपियन देशो में 3- 4 हजार ऑपरेशन में प्लासेन्टा मेम्बर का सफल प्रयोग किया है और भारत में भी इसका पेटेंट करवाकर प्रयोग के लिए प्रयासरत है। जब इस बारे में मरीज और उनके परिजनों से बात की गई, तो बताया कि यह बहुत अच्छा अनुभव रहा। सिजेरियन डिलेवरी के बाद 2-3 दिन में ही घाव भर गया और अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

"नून हॉस्पिटल के मेनेजिंग डायरेक्टर रजत अरोड़ा बताते है कि यह एनवायरमेंट फ्रेण्डली ड्रेसिंग है। जिसके लिए नून हॉस्पिटल एक उदाहरण पेश कर रहा है।"

आपको बता दे कि इस तरह की चिकित्सा विधि स्वास्थ्य के साथ- साथ पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र भी एक बड़ी उपलब्धि है। जो मरीजों के साथ- साथ देश की अर्थ व्यवस्था में भी सहायक सिद्ध होगी।



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