कपिल चौहान | भवानीमंडी: मैं हूँ भैसोदा, मेरा जन्म 300 साल पुराना माना जाता है। आज सभी शहरवासी गौरव दिवस मना रहे है। 2 जुलाई 2020 को भैसोदा गांव जो पंचायत हुवा करता था, नगर परिषद बना। धीरे-धीरे भैसोदा गांव अब शहरीकरण की ओर अग्रसर हो रहा है। मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले के अंतिम छोर पर बसा यह गांव राजस्थान में झालावाड़ जिले के भवानीमंडी से सटा है, जो अपने आप में कई विशेषताए रखता है। आज गौरव दिवस के दिन हम शहर के गौरव व इतिहास के बारे में आपको कई रोचक चीजे बताने का प्रयास करेंगे।
सबसे पहले बात करते है आखिर भैसोदा को भैसोदा के नाम से क्यो जाना जाता है। कब इसके नाम की उत्त्पत्ति हुई और क्यों..? पुराने लोग बताते है कि भैसोदा में सर्वपूज्य माताजी की सवारी भैंसा की होने से इस स्थान का नाम भैसोदा पड़ा और तभी से आजतक लोग इस शहर को भैसोदा के नाम से पुकारते है। वर्तमान में नगर परिषद के पास इन्ही माताजी का स्थान भी है जहां मामाजी महाराज विराजमान है।
अब बात करते है शहर की शिक्षा व्यवस्था की। रियासतकाल में हरएक गांव में स्कूल होना और शिक्षा का माध्यम होना आसान नही था। उस दौर में भैसोदा में शिक्षा की नीवं सन 1930 में ही रखी जा चुकी थी। खुशी की बात है कि वर्तमान में एक शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कन्या हाई स्कूल, 3 से 4 शासकीय माध्यमिक विद्यालय संचालित हो रहे है। वही भैसोदा के अंर्तगत ही आने वाले मालीपुरा क्षेत्र में सन 1927-28 के करीब एक आश्रम दिव्यांग छात्राओ को शिक्षा देने के लिए खोला गया था, जो वर्तमान में बुनियादी स्कूल के नाम से जाना जाता है।
बुनियादी स्कूल की समस्त भूमि बापट परिवार द्वारा शिक्षा विभाग को समर्पित की गई थी। इसी प्रकार गांव के जमीदार व नामचीन समाजसेवी स्वतंत्रता संग्राम सेनानीयो के सहयोगी रहे स्व प्रभुदयाल पटेल द्वारा शिक्षा विभाग को 6 बीघा से अधिक जमीन दान दी गई थी।
भैसोदा के अंतर्गत मालीपुरा क्षेत्र की कहानी भी बहुत रोचक है। दरअसल आजादी से पहले भवानीमंडी रेलवे स्टेशन का निर्माण कार्य चल रहा था उस समय टोंक से बड़ी संख्या में रेलवे मजदूर इस क्षेत्र में काम करने के लिए आये थे और लम्बे समय तक काम चलने के कारण यही बस गए। क्योंकि इसमें अधिकतर माली समाज से थे। इसीलिए गांव का नाम मालीपुरा जाना जाने लगा।
इस गांव के ईतिहासकार बताते है कि भैसोदा नगर परिषद पूर्व में ग्वालियर स्टेट के तहत टप्पा तहसील थी, जिसमे 18 गांव लगते थे। भैसोदा की रूपा नदी के किनारे भगवान शंकर का मंदिर है जिसकी स्थापना में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का विशेष योगदान रहा है।
रियासतकाल में जागीदारी प्रथा प्रचलित थी। जिसमे जागीरदार क्षेत्रवासियों से बेगार करवाते थे। जिसमे काम के लिए बाध्य करना और नही करने पर कठोर सजा दी जाती थी। उस समय गांव के सेवाजी महाराज द्वारा इसी प्रथा के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली, तब से बेगारी प्रथा का अंत हो गया।
सन 1962-63 में भैसोदा गांव में सबसे पहले बिजली पहुचीं थी और गांव जगमगाया था, जिसका श्रेय वरिष्ठ नागरिक व अध्यात्मिक व्यक्तित्व के धनी, इतिहासकर सत्यनारायण चौबे को जाता है। जो 1980 के दशक में विधायक का चुनाव भी लड़े थे। इसमे पड़ोसी राज्य राजस्थान सरकार का भी योगदान सरहानीय रहा।
1925-26 से एक जिनिंग प्रेस सेठ लक्ष्मीनारायन गनेडिवाल द्वारा संचालित होता था, सरकार ने कपास की खेती व उद्योग संचालित करने के लिए हजारों बीघा जमीन सेठ को दी थी। उस समय क्षेत्र के कई किसान कपास की खेती करने लगे थे और उद्योग को भी बढ़ावा मिलता था। हालांकि कुछ सालों बाद ही वह मिल बंद हो गई।
इस गांव में पेयजल की समस्या प्रारम्भिक काल से ही है। कुछ समय पड़ोसी राज्य राजस्थान से हुई एक सन्धि के बाद राजस्थान से पेयजल सप्लाई होता था। तत्कालीन समय में समस्या के निदान के लिए एक कुंवा बनाया गया जिसे वर्तमान में चौबे जी के कुवे के नाम से जाना जाता है। लम्बे समय से आधी से अधिक आबादी के लिए यह एक बड़ा पेयजल स्रोत बना हुवा है।
भैसोदा में पहली पंचायत का गठन 1950 में हुवा था उस वक्त प्रथम सरपँच लक्ष्मीनारायन टेलर बने थे। वही शिवनारायण पटेल सबसे अधिक बार सरपँच रहे, लोकमत के अनुसार लगभग 30 साल तक उन्होंने इस गांव के सरपंच के रूप में महती भूमिका निभाई। गायत्री अजय पौराणिक नगर की प्रथम नगर परिषद की प्रथम नगर परिषद अध्यक्ष बनी, जो वर्तमान में नगर परिषद कार्यकाल में अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है।
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