मकर संक्रांति की सुबह, अपने नियमित प्रातः भ्रमण के दौरान एसडीएम श्रद्धा गोमे की नजर बायपास स्थित सिकलीगर बस्ती पर पड़ी। गाड़िया लोहार समुदाय की इस बस्ती में खेलते बच्चों को देखकर उन्होंने सहज जिज्ञासा से संवाद किया। बातचीत में सामने आया कि बस्ती में लगभग 30 बच्चे ऐसे हैं जो विद्यालय जाने की आयु में हैं, लेकिन जागरूकता और संसाधनों के अभाव में आज तक स्कूल की दहलीज भी नहीं लांघ पाए। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए गोमे ने इसे केवल एक प्रशासनिक सूचना मानकर आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि इसे अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में लिया। मकर संक्रांति के अगले ही दिन वे स्वयं बस्ती में पहुँचीं और बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों से आत्मीय संवाद किया। उन्होंने शिक्षा के महत्व, उसके दीर्घकालिक लाभ और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य में इसकी भूमिका को सरल, सहज और प्रेरक शब्दों में समझाया। इस दौरान नगरपालिका एवं शिक्षा विभाग की टीम की मौजूदगी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि प्रशासन बच्चों की शिक्षा को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बच्चों के मन में पढ़ाई के प्रति उत्साह जगाने के उद्देश्य से एसडीएम के निर्देशन में सभी बच्चों को मिठाई के साथ स्कूल किट वितरित की गई। किताबें और कॉपियाँ हाथ में आते ही बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान उभरी, वह इस पहल की सबसे बड़ी सफलता थी। उनकी आँखों में पहली बार स्कूल जाने की ललक साफ झलक रही थी।
यहीं यह पहल नहीं रुकी। उपखण्ड अधिकारी ने शिक्षा विभाग को निर्देशित किया कि क्षेत्र में ऐसे सभी बच्चों का सर्वे किया जाए जो विद्यालय जाने की आयु में हैं, लेकिन किसी कारणवश स्कूल से दूर हैं, ताकि समय रहते ठोस और सकारात्मक कदम उठाए जा सकें। इन सतत प्रयासों का परिणाम 20 जनवरी 2026 को सामने आया, जब उन सभी 30 बच्चों का औपचारिक रूप से विद्यालय में नामांकन कराया गया। यह क्षण न केवल बच्चों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक बन गया। प्रशासन की इस संवेदनशील पहल से प्रेरित होकर स्थानीय भामाशाह ने भी आगे बढ़कर बच्चों को स्वेटर, पुस्तकें, बस्ता, पेंसिल सहित संपूर्ण विद्यालय किट वितरित की तथा विद्यालय में खेलकूद गतिविधियों के विकास में सहयोग देने की घोषणा की।
विद्यालय में नामांकन और आवश्यक सामग्री मिलने पर बच्चों एवं उनके अभिभावकों के चेहरों पर अपार खुशी और संतोष साफ दिखाई दिया। उत्साहित बच्चों ने उपखण्ड अधिकारी से वादा किया कि वे नियमित रूप से विद्यालय आएँगे, मन लगाकर पढ़ाई करेंगे और अपने साथ अन्य बच्चों को भी शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रेरित करेंगे।
यह कहानी केवल 30 बच्चों के स्कूल में दाखिले की नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनशील प्रशासनिक सोच की मिसाल है, जो एक सुबह की सैर को भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना देती है। श्रद्धा गोमे की यह पहल साबित करती है कि जब नेतृत्व में मानवीय दृष्टिकोण हो, तो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चों के जीवन में भी उजाला लाया जा सकता है।



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