मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में तीन गांवों में एक अनोखी परंपरा होती है. यहां लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर आग के अंगारों से गुजरते हैं. इस परंपरा के साथ सिलवानी के दो गांवों और वेगामगंज के एक गांव में होली मनाई जाती है. यह परंपरा चंद्रपुरा में 15 सालों से चलती आ रही है. वहीं महगमा गांव में तो ये परंपरा 500 सालों से चलती आ रही है. तीसरे बेगमगंज के सेमरा गांव में भी 150 सालों से होली के दहकते अंगारों पर गांव के लोग चलते हैं.
सैकड़ों सालों से चल रही परंपरा
होलिका दहन के बाद रात में सिलवानी तहसील से महज 14 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत हथौड़ा के गांव महगवा और महज 4 किमी दूर बसे ग्राम पंचायत डुंगरिया कला में चंदपुरा गांव है. चंद्रपुरा के लोग पिछले 15 सालों से दहकते अंगारों पर चलते हैं. महगवा गांव में ग्रामीण करीब 500 सालों से आग पर चलते आ रहे हैं. महगवा में 300 से ज्यादा मकान हैं. इनमें रहने वाले लोगों की आबादी लगभग एक हजार है. यहां हर साल होलिका दहन के बाद रात में ही सभी ग्रामीण धधकते हुए अंगारों के बीच से नंगे पैर गुजरते आ रहे हैं.
देखने के लिए जुटती है भारी भीड़
वहीं बेगमगंज के गांव सेमरा में भी 150 सालों से लोग धधकते अंगारों से निकलते हैं. बच्चे और महिलाएं जलते हुए अंगारों पर ऐसे चलते हैं. जैसे फूलों पर चल रहे हो. वह बिना किसी हिचक एक-एक कर अंगारों पर चलते हैं. महगवा गांव के चौराहे पर विधि विधान के साथ पूजा अर्चना के बाद ग्रामीणों के सहयोग से होलिका दहन किया जाता है. होलिका दहन को देखने के लिए आसपास के कई गावों के लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं.
बच्चे, बूढ़े, जवान और महिलाएं भी
इसी तरह चंद्रपुरा गांव में भी लगभग 15 सालों से यह आयोजन हो रहा है. इस साल आसपास के कई जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और प्रसाद चढ़ाया. साथ ही दहकते अंगारों पर बूढ़े बच्चे, और जवान और महिलाएं भी चलीं. गांव वालों के मन में प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त रहने का विश्वास रहता है. होलिका दहन के धधकते हुए अंगारों पर नंगे पैर चलने का सिलसिला करीब सेकड़ों सालों से चल रहा है.

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