कैसे होती है परंपरा?
माताजी के साधक परंपरागत सोलह श्रृंगार कर, एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में धधकती ज्वाला से भरा खप्पर लेकर नंगे पैर जुलूस निकालते हैं। उनके पीछे हजारों श्रद्धालु “जय माता दी” के जयकारे लगाते हुए चलते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच यह जुलूस कस्बे के प्रमुख मार्गों से होता हुआ राम मंदिर के पीछे स्थित शीतला माता मंदिर पहुंचता है। यहां सभी घोड़ले संगम करते हैं, पूजा-अर्चना होती है और फिर अपने-अपने थानक लौट जाते हैं।
किन मंदिरों से निकलते हैं घोड़ले?
बस स्टैंड स्थित चामुंडा माताजी
दुधाखेड़ी माताजी
लालबाई माताजी (घाणा चौक)
बिजासन माताजी
हिंगलाज माताजी
कालकी माताजी
सभी घोड़ले राम मंदिर चौक और छत्री चौक से गुजरते हुए भव्य गरबा और आरती के बाद शीतला माता मंदिर पहुंचते हैं।
सुनेल का इतिहास
सुनेल, जिसे पहले सुनेल-टप्पा कहा जाता था, कभी होल्कर रियासत का हिस्सा रहा है। आहू नदी किनारे बसा यह कस्बा व्यापार और कृषि के लिए प्रसिद्ध था।
1 नवंबर 1956 को यह क्षेत्र मध्य प्रदेश से अलग होकर राजस्थान में शामिल हुआ। अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल में यहां मंदिरों और घाटों का विशेष महत्व बढ़ा।
आज भी जीवंत परंपरा
हर नवरात्रा को सुनेल कस्बा धार्मिक आस्था से सराबोर हो जाता है। माताजी के घोड़ले निकलने की परंपरा न सिर्फ स्थानीय श्रद्धालुओं को जोड़ती है, बल्कि जिलेभर के लोगों को भी आकर्षित करती है।

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