भवानीमंडी। कपिल चौहान: एक समय नगर में भलाई की दीवार जरूरतमंदों के लिए संजीवनी साबित होती थी। यहां दानदाता अपने पुराने और उपयोगी कपड़े टांग जाते थे और जरूरतमंद लोग अपनी आवश्यकता अनुसार उन्हें ले जाते थे। यह व्यवस्था इतनी व्यवस्थित थी कि रोजाना सुबह 5 बजे और रात 11 बजे तक स्वयंसेवक कपड़ों को सजाते-संवारते थे, ताकि कोई भी जरूरतमंद सम्मानपूर्वक कपड़े ले सके।
विशेषकर दिवाली जैसे अवसरों पर यह दीवार आशा की किरण बनती थी। दानदाता कपड़े टांगते और गरीब परिवार खुशी-खुशी उन्हें ग्रहण करते।
लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। भलाई की दीवार पर कपड़ों के बजाय कचरे का ढेर नजर आता है। न तो दानदाता सक्रिय हैं और न ही नगर पालिका इसकी देखरेख कर रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नए काम शुरू करने की बजाय प्रशासन ने पुराने अच्छे कामों को भी खराब कर दिया है।
जनता का कहना है कि नगर पालिका की लापरवाही ने इस सराहनीय पहल को समाप्तप्राय बना दिया है। अब जनता स्वयं समझ रही है कि प्रशासनिक निष्क्रियता किस तरह समाज की भलाई के प्रयासों को प्रभावित कर रही है।

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