वर्षों पुरानी जल विरासतें अतिक्रमण, गंदगी और देखरेख के अभाव में धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। तहसील का प्राचीनतम पचपहाड़ तालाब आज बदहाली की तस्वीर बन चुका है। तालाब के आसपास अतिक्रमण और नियमविरुद्ध बसावट लगातार बढ़ रही है। हालात यह हैं कि तालाब का क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। जगह- जगह कचरे के ढेर और गंदगी फैली हुई है, जिससे इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी खत्म होती जा रही है। पुराने लोग बताते है कि एक समय था जब तालाब के पास बने कुवो का पानी इतना मीठा था कि लोग पीने का पानी कुवे से खींचकर लाया करते थे। वह कुवे भी लुप्त हो गए। इसी तरह पचपहाड़ से गुजरने वाली पिप्लाद नदी और उससे जुड़े बांध की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है।
अंग्रेजों के जमाने में बने इस मानव निर्मित बांध के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की लंबे समय से मांग उठ रही है। बांध के समीप पूर्व विधायक रामचंद्र सुनारीवाल के कार्यकाल में करीब पांच लाख रुपए की लागत से स्नान घाट का निर्माण कराया गया था, लेकिन रखरखाव के अभाव में अब वह भी टूट-फूट का शिकार होकर बदहाली बयां कर रहा है। पिप्लाद नदी का उद्गम पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले से होता है। यह नदी पचपहाड़ क्षेत्र से होकर पिप्लाद डेम में मिलती है। इसी से क्षेत्र में जल सप्लाई होती है। नदी में लगातार मिल रहे अपशिष्ट और गंदे पानी के कारण इसे देश की प्रदूषित नदियों में भी शामिल किया जा चुका है। पर इसको शुद्ध करने की बजाय करीब 30 करोड़ से ज्यादा खर्च कर राजगढ़ डेम से पानी लाने की योजना तैयार है। जो एक राजनीतिक विडम्बना से कम नही है।
वार्ड नम्बर 5 स्थित बालाजी मंदिर के पास वाली बावड़ी भी गाद व कचरे से सनी है। ना सफाई है और ना सुरक्षा। उपेक्षा के कारण यह जलधरोहर भी धीरे-धीरे खस्ताहाल होती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार एक ओर जल संरक्षण को लेकर अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र की ऐतिहासिक जल धरोहरों के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास नहीं हो रहे। लोगों ने प्रशासन से पचपहाड़ तालाब, पिप्लाद नदी, बांध और बावड़ियों के पुनर्जीवन के लिए विशेष योजना बनाकर कार्य शुरू करने की मांग की है।
इसको लेकर 31 मई व 5 जून पर्यवारण दिवस पर पचपहाड़ में जागरूकता अभियान व श्रमदान किया जाएगा।
-देवमित्र कानूनगो, नोडल अधिकारी वंदे गंगा अभियान नगर पालिका

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