कपिल चौहान | भवानीमंडी: सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था। कंजर बस्ती की तंग गलियों में रोज़ की तरह सन्नाटा पसरा था। कुछ चेहरे ऐसे थे, जिनकी पहचान वर्षों से पुलिस की फाइलों में दर्ज थी। बच्चों की आंखों में स्कूल नहीं, बल्कि समाज की बेरुखी का डर था। हर दस्तक उन्हें यही एहसास कराती थी कि उनकी पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके समुदाय से होती है।
ऐसा लगता था मानो उनकी तकदीर पहले ही लिख दी गई हो। लेकिन... इसी कहानी का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था।
झालावाड़ के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार ने जब जिले की कमान संभाली, तो उनके सामने अपराध के आंकड़े थे, लेकिन उन आंकड़ों के पीछे छिपी इंसानी जिंदगी भी थी। उन्होंने महसूस किया कि हर अपराधी जन्म से अपराधी नहीं होता, कई बार परिस्थितियां उसे उस रास्ते तक पहुंचा देती हैं।
एसपी अमित कुमार खुद कंजर बस्ती पहुंचे। वहां न कोई पुलिसिया रौब था, न कार्रवाई का डर। उन्होंने लोगों से संवाद किया, उनकी परेशानियां सुनीं और एक सवाल पूछा कि अगर आपको सम्मान से जीने का मौका मिले... क्या आप अपराध छोड़ देंगे? शुरुआत में किसी को विश्वास नहीं हुआ। लोगों को लगा, यह भी शायद कोई औपचारिक मुलाकात होगी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद पुलिस ने ऐसा कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। पुलिस प्रशासन ने उद्योग प्रबंधन से समन्वय स्थापित किया और कंजर समुदाय के लोगों को आरटीएम मिल में रोजगार दिलाने की पहल शुरू कर दी। एक-एक कर करीब 100 परिवारों के सदस्य मिल में काम करने लगे। जिस बस्ती में कभी पुलिस की गाड़ियों की आवाज सुनकर लोग सहम जाते थे, वहां अब सुबह-सुबह मजदूरी पर जाने वाले लोगों की चहल-पहल दिखाई देने लगी। जिन हाथों पर कभी अपराध के आरोप लगते थे, उन्हीं हाथों में अब मेहनत की कमाई थी। बच्चों की आंखों में पहली बार स्कूल जाने के सपने दिखने लगे और महिलाओं के चेहरों पर भविष्य की उम्मीद झलकने लगी। यह केवल नौकरी नहीं थी...यह समाज की मुख्यधारा में लौटने का टिकट था।
झालावाड़ पुलिस की इस पहल ने यह भी साबित किया कि अपराध पर सबसे बड़ी जीत केवल हथकड़ियां पहनाने से नहीं मिलती, बल्कि तब मिलती है जब किसी को अपराध छोड़ने की वजह मिल जाए।
आज कंजर बस्ती के कई परिवार नई जिंदगी की शुरुआत कर चुके हैं। उनकी पहचान अब अपराध से नहीं, बल्कि मेहनतकश मजदूर, जिम्मेदार अभिभावक और समाज के सम्मानित नागरिक के रूप में बनने लगी है। एसपी अमित कुमार की यह पहल सिर्फ पुलिसिंग का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि संवेदनशील सोच, संवाद और रोजगार का अवसर मिल जाए तो सबसे कठिन समझा जाने वाला बदलाव भी संभव है।
कभी अपराध की राह पर भटकने वाले कदम... आज सम्मान की ओर बढ़ रहे हैं। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे खूबसूरत अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

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