वट सावित्री व्रत पर सुहागिनों द्वारा बरगद की पूजा, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती परंपरा

झालावाड़:हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। सुहागिन स्त्रियों ने वट वृक्ष की पूजा कर अखंड सौभाग्य का वरदान मांगा। शगुन सिटी निवासी दिनेश शर्मा ने बताया कि इस बार वट पूजा की तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति थी, लेकिन यह सोमवार को ही मनाई गई। 26 मई को दोपहर 12:12 बजे से मंगलवार सुबह 08:31 बजे तक वट वृक्ष की पूजा की जाएगी। उदिया तिथि के अनुसार 26 को व्रत और पूजन करना उचित रहेगा। नया गांव के राकेश पंडित ने कहा कि इस दिन उग्र ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए सप्त अनाज (गेहूं, जौ, दाल, चना, तिल, चावल, मक्का) का दान करते हैं। बरगद की जड़ों में गंगा जल अर्पित करने से ग्रहों की अनुकूलता के साथ जीवन की बाधाएं हटती हैं और सृजनात्मक शक्ति बढ़ती है। लाड कंवर ने बताया इस दिन महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष का पूजन कर अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि व संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त करती है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। बलराम शर्मा बताते है कि मार्कण्डेय ऋषि को भगवान शिव के वरदान से वट के पत्ते पर बालमुकुंद (भगवान विष्णु) के दर्शन हुए थे। तभी से वट वृक्ष की पूजा का महत्व बढ़ गया। माना जाता है कि वट वृक्ष की पूजा करने से घर में सुख शांति और धन समृद्धि आती है।शशि सिंह शेखावत ने बताया कि  सच्चे मन से आस्था के साथ व्रत करते है तो वट वृक्ष की शारीरिक अनुपस्थिति आपके पुण्य या फल में कोई कमी नहीं लाती। सावित्री ने अपने संकल्प और निष्ठा से यमराज तक को झुका दिया था। उसी भावना से अगर आप व्रत करें, तो परिणाम भी उतना ही फलदायी होगा। संतोष अग्रवाल ने कहा, सभी महिलाएं देवी सावित्री के पतिव्रत धर्म, त्याग और तपस्या का स्मरण करती हैं। यह पर्व न केवल सौभाग्यवर्धक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। आरती सिसोदिया ने बताया कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास माना जाता है। मां सावित्री भी वट वृक्ष में निवास करती हैं। पूजा के दौरान सुहागिन महिलाएं ने सावित्री- सत्यवान की कथा विस्तार पूर्वक सुनी और इस दौरान सभी महिलाएं वट वृक्ष के चारों तरफ कच्चे सूत या फिर कलावे से 7 से लेकर 21 बार परिक्रमा करते हुए रक्षासूत्र बांधकर अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करती दिखी।


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