57 दिन की संलेखना साधना पूर्ण कर राजुल बाई ने किया देह त्याग, जैन समाज ने दी श्रद्धांजलि

भवानीमंडी । नगर की तिरुपति नगर, ज्ञानविहार रोड निवासी राजुल बाई चेनावत (75), पत्नी स्वर्गीय सज्जन सिंह चेनावत (रामपुरा वाले), ने 57 दिनों की संलेखना (संथारा) साधना पूर्ण करने के बाद सोमवार सुबह 7:50 बजे शांतिपूर्वक देह त्याग दिया। उनके देवलोकगमन पर जैन समाज सहित क्षेत्र के लोगों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

जानकारी के अनुसार राजुल बाई चेनावत ने 4 मई 2026 को सागारी संथारे के प्रत्याख्यान ग्रहण किए थे। इसके बाद उन्होंने सांसारिक आरम्भ एवं परिग्रह का त्याग कर संयममय जीवन अपनाया। 22 मई को उन्होंने पूज्या महासती जी से यावज्जीवन संलेखना संथारा ग्रहण किया। 57 दिनों की तपस्या, साधना और आत्मसंयम के उपरांत सोमवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। प्रदीप बोहरा ने बताया कि दिवंगत की अंतिम महाप्रयाण यात्रा सोमवार दोपहर 12:30 बजे तिरुपति नगर स्थित उनके निवास से नीलकंठ मुक्तिधाम के लिए निकाली गई। यात्रा में बड़ी संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु शामिल हुए।

क्या है संथारा (संलेखना)?

संथारा, जिसे संलेखना या समाधिमरण भी कहा जाता है, जैन धर्म की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा है। जैन दर्शन के अनुसार जब किसी व्यक्ति को जीवन का अंतिम समय निकट प्रतीत होता है और वह शारीरिक रूप से सामान्य जीवन जीने में असमर्थ हो जाता है, तब वह गुरु की आज्ञा एवं धार्मिक विधि-विधान के अनुसार क्रमशः आहार-जल का त्याग करते हुए आत्मचिंतन, संयम और वैराग्य के साथ जीवन का समापन करता है।

जैन धर्म में संलेखना का उद्देश्य मृत्यु को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अंतिम समय में राग-द्वेष, क्रोध, मोह और आसक्ति का त्याग कर मन को पूर्णतः शांत एवं निर्मल बनाना माना गया है। इस दौरान व्यक्ति सभी के प्रति क्षमा-भाव रखता है तथा स्वयं भी सभी से क्षमा याचना करता है। जैन समाज में इसे अत्यंत पवित्र, आध्यात्मिक एवं आत्मशुद्धि की साधना के रूप में देखा जाता है।

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